खाटू कहानी

Khatu Shyam Ji History Background
विशेष इतिहास (Detailed History)

Khatu Shyam Ji History in Hindi:
बर्बरीक से खाटू श्याम तक का सम्पूर्ण इतिहास

Khatu Kahani Author Khatu Kahani Team
Updated: April 15, 2026
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राजस्थान के सीकर जिले में अरावली की पहाड़ियों के बीच बसा Shree Khatu Shyam Mandir आज भारत ही नहीं, बल्कि विश्वभर में रहने वाले लाखों-करोड़ों भक्तों की आस्था, विश्वास और चमत्कारों का सबसे बड़ा केंद्र है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कलियुग के देव माने जाने वाले खाटू श्याम जी वास्तव में कौन हैं? महाभारत के उस वीर, निडर और अजेय योद्धा की कहानी क्या है, जिसने मात्र तीन बाणों से पूरे कुरुक्षेत्र के युद्ध को समाप्त करने की क्षमता रखी थी? आइए, आज हम वीर बर्बरीक के जन्म से लेकर 'खाटू श्याम' बनने तक के उस सम्पूर्ण, रहस्यमयी और अलौकिक इतिहास को बहुत ही गहराई से समझते हैं।

Who is Khatu Shyam Ji? (वीर बर्बरीक का जन्म और वंशावली)

हिन्दू धर्म और हमारे प्राचीन पुराणों (विशेषकर स्कंद पुराण के माहेश्वर खंड) के अनुसार, खाटू श्याम जी को कलियुग में भगवान श्रीकृष्ण का ही साक्षात अवतार माना जाता है। द्वापर युग में उनका वास्तविक नाम वीर बर्बरीक (Veer Barbarik) था। बर्बरीक महाभारत काल के सबसे शक्तिशाली, अजेय और मायावी योद्धाओं में से एक थे, जिनकी युद्ध कला का कोई सानी नहीं था।

यदि हम बर्बरीक की वंशावली और उनके जन्म की पृष्ठभूमि की बात करें, तो वे महान पांडव महाबली भीम (Bhima) के पोते थे। अज्ञातवास के दौरान भीम का विवाह राक्षसी हिडिम्बा से हुआ था, जिससे उन्हें एक अत्यंत बलशाली और मायावी पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम घटोत्कच (Ghatotkacha) था।

घटोत्कच भी अपने पिता की तरह अत्यंत पराक्रमी था। समय के साथ घटोत्कच का विवाह प्राग्ज्योतिषपुर (आधुनिक असम के क्षेत्र) के दैत्यराज मूर की पुत्री 'मोरवी' से हुआ। माता मोरवी को शास्त्रों में कामकटंकटा या अहिलावती के नाम से भी जाना जाता है। इन्हीं घटोत्कच और माता मोरवी के आंगन में एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम बर्बरीक रखा गया।

मान्यता है कि जन्म के समय ही इस बालक के बाल घुंघराले और एक बब्बर शेर की तरह अयाल (Mane) जैसे प्रतीत होते थे, इसी विशिष्ट शारीरिक संरचना के कारण उनका नाम 'बर्बरीक' रखा गया। बचपन से ही वे कोई साधारण बालक नहीं थे, बल्कि उनमें अपार शारीरिक बल, देवीय शक्तियां और धर्म के प्रति एक गहरी समझ मौजूद थी। माता मोरवी स्वयं भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त थीं, इसलिए उन्होंने बर्बरीक को बचपन से ही धर्म, कर्म और युद्ध कला की उत्कृष्ट शिक्षा दी।

Tapasya and The Three Arrows (महादेव की घोर तपस्या और तीन अचूक बाण)

बर्बरीक अपनी माता के संस्कारों के कारण बचपन से ही एक वीर और पराक्रमी योद्धा बनने के मार्ग पर थे। उन्होंने अपनी माता और भगवान श्रीकृष्ण के निर्देशन में युद्ध कला की सभी बारीकियां सीखीं। जब वे युवा हुए, तो माता मोरवी के उपदेशानुसार, बर्बरीक ने महिसागर संगम (जहाँ मही नदी समुद्र में मिलती है, जिसे गुप्तक्षेत्र भी कहा जाता है) पर जाकर घोर और अत्यंत कठोर तपस्या की।

उन्होंने वर्षों तक भगवान शिव (Lord Shiva) और नवदुर्गा की आराधना की। उनकी इस अकल्पनीय और निस्वार्थ तपस्या से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। महादेव ने साक्षात प्रकट होकर बर्बरीक को वरदान स्वरूप तीन अचूक और दिव्य बाण (Three Infallible Arrows) प्रदान किए।

इसके साथ ही उन्हें अग्निदेव (God of Fire) द्वारा एक विशेष और अभेद्य धनुष भी प्राप्त हुआ, जो तीनों लोकों का भार सह सकता था। भगवान शिव द्वारा दिए गए इन तीन बाणों की कार्यप्रणाली इतनी अद्भुत थी कि इसने बर्बरीक को पूरे ब्रह्मांड का सबसे अजेय योद्धा बना दिया:

  • पहला बाण (The Marking Arrow): जब इस पहले बाण को धनुष से छोड़ा जाता था, तो यह पलक झपकते ही उन सभी लोगों, वस्तुओं या सेनाओं को सफेद भस्म से चिह्नित (Mark) कर देता था जिन्हें बर्बरीक युद्ध में सुरक्षित रखना चाहते थे।
  • दूसरा बाण (The Target Arrow): यह दूसरा बाण उन सभी लक्ष्यों (शत्रुओं) को लाल रंग (Red mark) से चिह्नित करता था जिन्हें पूरी तरह से नष्ट या समाप्त किया जाना होता था।
  • तीसरा बाण (The Destroyer Arrow): यह सबसे विनाशकारी और अंतिम बाण था। यह बाण हवा में छूटते ही उन सभी लाल चिह्नित लक्ष्यों को एक ही पल में भेद देता था और उन्हें समाप्त करके तुरंत वापस बर्बरीक के तरकश में लौट आता था।

इन तीन दिव्य और चमत्कारिक बाणों की वजह से ही बर्बरीक को आज पूरी दुनिया में 'तीन बाण धारी' (Teen Baan Dhari) के नाम से भी जाना और पूजा जाता है। इन बाणों की शक्ति इतनी असीमित और अचूक थी कि बर्बरीक अकेले ही कौरवों (Kauravas) और पांडवों (Pandavas) की विशाल सेना को चंद मिनटों (कहा जाता है मात्र 1 मिनट) में समाप्त कर सकते थे। उन्हें युद्ध लड़ने के लिए लाखों की सेना की आवश्यकता नहीं थी, उनके तरकश में रखे ये तीन बाण ही उनके लिए ब्रह्मास्त्र के समान थे।

The Promise to Mother (माता को दिया गया 'हारे का सहारा' बनने का वचन)

समय अपनी गति से बीतता गया और वह समय आ गया जब कुरुक्षेत्र के मैदान में धर्म और अधर्म के बीच महाभारत (Mahabharata) का विश्वविनाशक युद्ध शुरू होने की घोषणा हो गई। जब युद्ध की खबरे चारों ओर फैलीं, तो एक सच्चे क्षत्रिय की भांति वीर बर्बरीक के भीतर भी रणभूमि में उतरने, अपने पराक्रम का प्रदर्शन करने और इस ऐतिहासिक युद्ध को देखने की तीव्र इच्छा जागृत हुई।

जब वे अपने नीले रंग के घोड़े (जिसे 'लीला घोड़ा' कहा जाता है) पर सवार होकर कुरुक्षेत्र की ओर जाने के लिए तैयार हुए, तो उन्होंने परंपरानुसार अपनी माता मोरवी से युद्ध में जाने की आज्ञा ली। माता ने अपने पुत्र का तेज देखा और उनसे पूछा, "पुत्र, तुम इतना भयंकर युद्ध देखने जा रहे हो, यह कोई साधारण युद्ध नहीं है। यदि वहां जाकर तुम्हारे भीतर युद्ध करने की इच्छा हुई तो तुम किस पक्ष की ओर से अपने शस्त्र उठाओगे?"

बर्बरीक ने अत्यंत सरलता से मुस्कुराते हुए उत्तर दिया कि वे तो केवल युद्ध देखने जा रहे हैं और वे किसी के भी पक्ष में नहीं हैं। लेकिन एक माँ का हृदय जानता था कि उनका क्षत्रिय पुत्र युद्ध देखेगा तो चुप नहीं बैठेगा। माता ने ज़ोर देकर पूछा, "फिर भी यदि शस्त्र उठाने ही पड़े, तो क्या करोगे? मुझे वचन दो।"

"वीर बर्बरीक ने अपनी माता को एक ऐसा ऐतिहासिक वचन दिया जिसने भविष्य की दिशा ही बदल दी। उन्होंने कहा— 'हे माता! मैं यह प्रतिज्ञा करता हूँ कि महाभारत के इस युद्ध में जो भी पक्ष हार रहा होगा (निर्बल होगा), मैं उसी का साथ दूंगा और उसी की ओर से अपने बाण चलाऊंगा।'"

यह कोई सामान्य वचन नहीं था। यही वह महान और अटूट वचन है जिसके कारण आज पूरी दुनिया में बाबा श्याम को "हारे का सहारा" (Haare Ka Sahara) कहा जाता है। क्योंकि बाबा श्याम आज भी कलियुग में उन भक्तों का साथ देते हैं जो जीवन के हर संघर्ष में निर्बल पड़ जाते हैं, जो हर तरफ से निराश हो चुके होते हैं और जो दुनिया की नज़रों में हार मान चुके होते हैं।

Lord Krishna's Test (श्रीकृष्ण द्वारा पीपल के पत्तों की परीक्षा)

जब अंतर्यामी और सर्वज्ञाता भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) को यह पता चला कि बर्बरीक युद्ध भूमि की ओर प्रस्थान कर रहे हैं और उन्होंने अपनी माता को 'हारने वाले का साथ' देने का अटल वचन दिया है, तो वे अत्यंत चिंतित हो गए।

श्रीकृष्ण इस युद्ध के वास्तविक परिणाम को जानते थे। वे जानते थे कि कौरवों की सेना पांडवों से बहुत बड़ी (कौरवों के पास 11 अक्षौहिणी और पांडवों के पास 7 अक्षौहिणी सेना थी) है। इस कारण युद्ध के शुरुआती दिनों में कौरवों का पलड़ा भारी रहेगा और पांडव हारने लगेंगे। ऐसे में बर्बरीक अपने वचन के अनुसार हारते हुए पांडवों की तरफ से लड़ने लगेंगे और कौरवों का तेजी से सफाया करने लगेंगे।

परन्तु, जैसे ही कौरव कमजोर पड़ने लगेंगे और हारने लगेंगे, तो बर्बरीक का वचन उन्हें कौरवों की तरफ जाने के लिए विवश कर देगा। इस प्रकार, वह बारी-बारी से दोनों पक्षों की तरफ से लड़ते रहेंगे। इस पेंडुलम (Pendulum) जैसी स्थिति का परिणाम यह होगा कि बर्बरीक अकेले ही दोनों सेनाओं का विनाश कर देंगे और अंत में रणभूमि में केवल बर्बरीक ही जीवित बचेंगे। इस प्रकार धर्म की स्थापना का श्रीकृष्ण का पूरा उद्देश्य ही विफल हो जाता।

इस भयानक परिणाम को रोकने के लिए श्रीकृष्ण ने तुरंत एक साधारण से ब्राह्मण (Brahmin) का भेष धारण किया और कुरुक्षेत्र के मार्ग में एक विशाल पीपल के पेड़ के नीचे बर्बरीक का रास्ता रोका। उन्होंने बर्बरीक को रोककर उनका मज़ाक उड़ाते हुए कहा, "हे वीर बालक! तुम सिर्फ ये तीन बाण लेकर इतना बड़ा और भयंकर युद्ध लड़ने जा रहे हो? जहाँ लाखों महारथी इकट्ठे हैं, वहां इन तीन तीरों से क्या होगा? तुम तो उपहास के पात्र लग रहे हो।"

बर्बरीक ने शांत और दृढ़ स्वर में अपनी शक्ति सिद्ध करने के लिए अपने तरकश से एक बाण निकाला और कहा, "हे विप्र! मेरे ये तीन बाण साधारण नहीं हैं। यदि मैं चाहूं तो केवल इस एक बाण से इस पीपल के पेड़ के सभी पत्तों को एक साथ भेद (छेद) सकता हूँ।"

ब्राह्मण रूपी कृष्ण ने उन्हें ऐसा करने की चुनौती दी और चालाकी से पीपल का एक पत्ता तोड़कर अपने पैर के नीचे छिपा लिया। बर्बरीक ने आँखें बंद कर भगवान शिव का ध्यान किया और अपना पहला बाण छोड़ दिया। उस बाण ने क्षण भर में पेड़ के सभी पत्तों में छेद कर दिया। उसके बाद वह अचूक बाण कृष्ण के पैर के पास आकर गोल-गोल मंडराने लगा।

बर्बरीक ने मुस्कुराकर कहा, "हे ब्राह्मण देवता, कृपया अपना पैर हटा लीजिए, अन्यथा यह दिव्य बाण आपके पैर को भेदकर उस पत्ते को भी छेद देगा जिसे आपने जानबूझकर छिपा रखा है। क्योंकि मेरा बाण अपने लक्ष्य को कभी नहीं छोड़ता।"

यह चमत्कार देखकर श्रीकृष्ण दंग रह गए और उन्हें इस बात का पूर्ण अहसास हो गया कि बर्बरीक को युद्ध भूमि में प्रवेश करने से किसी भी कीमत पर रोकना ही होगा, अन्यथा महाभारत का इतिहास कुछ और ही होगा।

The Supreme Sacrifice: Sheesh Daan (शीश का महादान)

बर्बरीक की इस अकल्पनीय और विनाशकारी शक्ति को देखकर ब्राह्मण के भेष में खड़े भगवान कृष्ण ने उनसे दान की मांग की। बर्बरीक, जो एक महान क्षत्रिय होने के साथ-साथ एक बहुत बड़े दानी भी थे, उन्होंने विनम्रता से कहा, "मांगिए ब्राह्मण देवता, आपको क्या चाहिए? एक क्षत्रिय होने के नाते मैं आपको अपना सर्वस्व दान कर सकता हूँ।"

तब कृष्ण ने बिना किसी हिचकिचाहट के बर्बरीक से उनका शीश (Head) दान में मांग लिया। यह भयंकर और अप्रत्याशित मांग सुनकर बर्बरीक एक पल के लिए चौंक गए। वे तुरंत समझ गए कि कोई भी साधारण या गरीब ब्राह्मण किसी क्षत्रिय से दान में उसका शीश नहीं मांग सकता। उन्होंने हाथ जोड़कर उस ब्राह्मण से अपने वास्तविक रूप में आने की प्रार्थना की।

भक्त की पुकार सुनकर भगवान श्रीकृष्ण अपने ब्राह्मण भेष से बाहर आए और उन्होंने बर्बरीक को अपने विराट और दिव्य रूप के दर्शन दिए। भगवान को अपने समक्ष देखकर बर्बरीक भावविभोर हो गए।

श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को समझाया कि इस धर्मयुद्ध से पहले रणभूमि को पवित्र करने के लिए और युद्ध की सफलता के लिए पृथ्वी के सबसे वीर, श्रेष्ठ और निडर क्षत्रिय के शीश की बलि (आहुति) देनी होती है। और इस समय तीनों लोकों में बर्बरीक से बड़ा, दानी और वीर कोई नहीं है। इसलिए धर्म की स्थापना के लिए यह बलिदान आवश्यक है।

यह परम सत्य जानकर बर्बरीक अत्यंत प्रसन्न हुए कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जा रहा है, बल्कि स्वयं भगवान के हाथों और धर्म की रक्षा के लिए हो रहा है। उन्होंने फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी (Dwadashi) के दिन प्रसन्नतापूर्वक अपनी ही तलवार से अपना शीश काटकर श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया। इसी महान, निस्वार्थ और अतुलनीय बलिदान के कारण आज पूरी दुनिया में उन्हें 'शीश का दानी' (Sheesh Ka Daani) कह कर पूजा जाता है।

Witnessing the Mahabharata (पर्वत से महाभारत युद्ध देखना और अंतिम निर्णय)

बर्बरीक ने अपना शीश दान करने से ठीक पहले श्रीकृष्ण से एक अंतिम विनती की थी। उन्होंने कहा, "हे प्रभु! मैं यह पूरा महाभारत युद्ध अपनी आँखों से देखना चाहता था। अब मेरा धड़ तो नहीं है, लेकिन कृपया मेरे इस शीश को ऐसी दृष्टि दें कि मैं इस धर्मयुद्ध का गवाह बन सकूं।"

श्रीकृष्ण ने अपने परम भक्त की यह अंतिम इच्छा सहर्ष स्वीकार की। उन्होंने बर्बरीक के कटे हुए शीश को अमृत से सींचा ताकि वह जीवित रहे, और उसे कुरुक्षेत्र के पास स्थित एक अत्यंत ऊंचे पर्वत (High Hill) पर स्थापित कर दिया। वहाँ से बर्बरीक के शीश ने पूरे 18 दिनों तक चलने वाले महाभारत के उस भयंकर और रक्तपात से भरे युद्ध को अपनी आँखों से देखा।

जब 18 दिन बाद महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ और धर्म की विजय (पांडवों की जीत) हुई, तो पांडव भाइयों (युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव) के बीच इस बात पर भारी विवाद और अहंकार पैदा हो गया कि युद्ध में जीत का असली श्रेय किसे जाता है। हर कोई अपने पराक्रम का बखान कर रहा था।

इस विवाद को सुलझाने के लिए श्रीकृष्ण सभी पांडवों को उस ऊंचे पर्वत पर ले गए जहाँ बर्बरीक का शीश रखा हुआ था। श्रीकृष्ण ने कहा कि चूँकि बर्बरीक ने पूरा युद्ध शुरू से अंत तक एक निष्पक्ष दर्शक के रूप में देखा है, इसलिए इसका सही निर्णय वही करेगा।

बर्बरीक के शीश ने पांडवों का अहंकार तोड़ते हुए उत्तर दिया, "मुझे इस पूरे युद्ध में किसी भी योद्धा का पराक्रम या बाहुबल नहीं दिखा। मैंने केवल भगवान श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र पूरे कुरुक्षेत्र में शत्रुओं का संहार करते देखा, और माता काली (महाकाली) को रणभूमि में पापियों का रक्त पीते हुए देखा। इसके अलावा मुझे कोई नहीं दिखा। यह विजय केवल और केवल माधव की लीला और उनकी रणनीति का परिणाम है।"

The Boon of 'Shyam' (कलयुग में 'श्याम' नाम से पूजे जाने का वरदान)

बर्बरीक के इस महान बलिदान, उनके असीम ज्ञान और निष्पक्ष न्याय से अत्यंत प्रसन्न होकर, भगवान श्रीकृष्ण ने उनके शीश को अपने हृदय से लगा लिया। उन्होंने बर्बरीक को कलियुग के लिए एक अमर और अद्वितीय वरदान दिया:

"हे वीर बर्बरीक! तुम्हारे इस त्याग से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। जब कलियुग का घोर अंधकार छाएगा, तब तुम मेरे ही नाम 'श्याम' (Shyam) से पूरी दुनिया में जाने और पूजे जाओगे। तुम्हारे सच्चे भक्तों के स्मरण मात्र से ही उनके सारे दुःख-दर्द, कर्ज और बीमारियाँ दूर हो जाएंगी। जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से तुम्हारे दरबार में आएगा, तुम उसकी हर मनोकामना पूर्ण करोगे और कलियुग में तुम ही देव रूप में पूजे जाओगे।"

यही कारण है कि आज बर्बरीक को 'बाबा खाटू श्याम' (Baba Khatu Shyam), 'कलियुग के अवतार', 'लखदातार' और 'हारे का सहारा' जैसे अनेक पवित्र नामों से पुकारा जाता है।

Appearance in Khatu & Temple History (खाटू धाम में प्राकट्य और मंदिर का इतिहास)

द्वापर युग की समाप्ति और कलियुग की शुरुआत के बाद, भगवान कृष्ण के वरदान के अनुसार बाबा श्याम को प्रकट होना था। सदियों तक बाबा श्याम का पवित्र शीश धरती के गर्भ में दफन रहा।

इतिहास और लोक कथाओं के अनुसार, राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू (Khatu) गाँव में जिस स्थान पर बाबा का शीश दबा हुआ था, वहां एक अद्भुत चमत्कार होने लगा। जब भी उस गाँव की एक विशेष गाय उस स्थान पर घास चरने जाती थी, तो उसके थनों से अपने आप दूध बहने लगता था और सीधा धरती में समा जाता था।

यह अद्भुत चमत्कार देखकर गाँव के लोगों को अचंभा हुआ। उन्होंने उस स्थान की सावधानीपूर्वक खुदाई करने का निर्णय लिया। जब उस स्थान को खोदा गया, तो वहाँ से फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को बाबा का पवित्र, तेजस्वी और दिव्य शीश प्रकट हुआ।

जिस पवित्र स्थान से यह शीश प्रकट हुआ था, उसे आज खाटू धाम में 'श्याम कुंड' (Shyam Kund) के नाम से जाना जाता है। भक्त आज भी इस कुंड में स्नान करके खुद को धन्य मानते हैं और मानते हैं कि इस कुंड के जल से शारीरिक रोग दूर हो जाते हैं।

बाबा के प्रकट होने के बाद, खाटू के तत्कालीन राजा रूपसिंह चौहान (Roop Singh Chauhan) को बाबा ने स्वप्न में दर्शन दिए और उस पवित्र स्थान पर एक भव्य मंदिर निर्माण करने का आदेश दिया। राजा ने तुरंत उस स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया। बाद में 1720 ईस्वी में मारवाड़ के दीवान अभय सिंह ने इस मंदिर का भव्य रूप से जीर्णोद्धार (Renovation) करवाया, जो आज का वर्तमान Khatu Shyam Mandir Rajasthan है।

चूँकि बाबा श्याम का शीश फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी (ग्यारस) को प्रकट हुआ था और इसी दिन उन्होंने शीश का दान भी दिया था, इसलिए हर साल खाटू धाम में फाल्गुन मेला (Falgun Mela) आयोजित होता है। यह मेला होली से ठीक पहले लगता है और इसमें दुनिया भर से लाखों भक्त निशान यात्रा (Nishan Yatra) लेकर रिंगस से खाटू तक पैदल आते हैं।

।। बोलिए खाटू नरेश की जय ।।
।। तीन बाण धारी की जय ।।
।। हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा ।।

Khatu Kahani Team

Khatu Kahani Editorial Team

पूर्ण रूप से समर्पित बाबा श्याम के श्री चरणों में। हमारा उद्देश्य खाटू श्याम जी के प्रामाणिक इतिहास, चमत्कारों और मंदिर की ताज़ा जानकारी को 1.5 लाख+ भक्तों के इस डिजिटल परिवार तक पूरी शुद्धता के साथ पहुँचाना है।

People Also Ask (FAQs)

Who is Khatu Shyam Ji in reality?

खाटू श्याम जी वास्तव में वीर बर्बरीक हैं, जो महाभारत काल में महाबली भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र थे। भगवान कृष्ण ने उनके अतुलनीय बलिदान से प्रसन्न होकर कलियुग में उन्हें अपने ही नाम 'श्याम' से पूजे जाने का अमर वरदान दिया था।

Why is Khatu Shyam called Haare Ka Sahara?

वीर बर्बरीक ने युद्ध में जाने से पूर्व अपनी माता मोरवी को वचन दिया था कि महाभारत के युद्ध में जो भी पक्ष हार रहा होगा, वह उसी का साथ देंगे। इस महान वचन और दीन-दुखियों की मदद करने के वरदान के कारण ही उन्हें 'हारे का सहारा' कहा जाता है।

Why did Barbarik give his head to Lord Krishna?

धर्मयुद्ध की शुरुआत से पहले रणभूमि को पवित्र करने के लिए पृथ्वी के सबसे वीर क्षत्रिय के शीश की आहुति की आवश्यकता थी। चूंकि पृथ्वी पर बर्बरीक से बड़ा कोई वीर नहीं था, इसलिए धर्म की रक्षा के लिए भगवान कृष्ण के मांगने पर बर्बरीक ने प्रसन्नतापूर्वक अपना शीश दान कर दिया था।