जय श्री श्याम! भारत में भगवान के कई भव्य और चमत्कारिक मंदिर हैं जहाँ उनके पूरे स्वरूप (शरीर) की पूजा की जाती है। लेकिन, राजस्थान के खाटू धाम (Khatu Dham) में भगवान का एक ऐसा मंदिर है जहाँ भगवान के सिर्फ शीश (सिर) की पूजा होती है। आखिर क्यों लाखों लोग एक "कटे हुए सिर" के सामने नतमस्तक होते हैं? भगवान श्रीकृष्ण ने वीर बर्बरीक (Baba Shyam) का सिर ही क्यों मांगा था, और उनके धड़ (शरीर) का क्या हुआ? आइए, महाभारत काल से जुड़े इस सबसे बड़े रहस्य से पर्दा उठाते हैं।
वीर बर्बरीक की प्रतिज्ञा (The Promise of Barbarik)
महाभारत के युद्ध के समय, पांडव पुत्र भीम के पौत्र (पोते) और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने भी कुरुक्षेत्र में जाने की इच्छा जताई। वह एक अजेय योद्धा थे। उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या करके तीन अचूक और चमत्कारिक बाण प्राप्त किए थे, जो पल भर में तीनों लोकों का विनाश कर सकते थे।
रणभूमि में जाने से पहले बर्बरीक ने अपनी माता (अहिलावती) से आज्ञा मांगी। माता जानती थीं कि बर्बरीक अत्यंत शक्तिशाली है। उन्होंने बर्बरीक से वचन लिया कि तुम युद्ध में उसी का साथ दोगे जो हार रहा होगा। बर्बरीक ने यह प्रतिज्ञा ली और इसीलिए आज उन्हें "हारे का सहारा" (Haare Ka Sahara) कहा जाता है।
श्रीकृष्ण की चिंता और ब्राह्मण वेश (Krishna's Disguise)
भगवान श्रीकृष्ण, जो स्वयं इस ब्रह्मांड के रचयिता हैं, वे भविष्य जानते थे। उन्हें पता था कि युद्ध में कौरवों की हार निश्चित है। अगर कौरव हारने लगेंगे, तो अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार बर्बरीक कौरवों की तरफ से लड़ने लगेगा और अपने अचूक बाणों से क्षण भर में पांडवों की सेना का विनाश कर देगा।
धर्म की रक्षा और धर्मराज युधिष्ठिर की जीत सुनिश्चित करने के लिए श्रीकृष्ण ने एक ब्राह्मण का वेश धारण किया और बर्बरीक के रास्ते में आ खड़े हुए। उन्होंने बर्बरीक की वीरता का मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि वह सिर्फ तीन बाणों से युद्ध कैसे लड़ सकता है?
अद्भुत शीश दान (The Ultimate Sacrifice)
ब्राह्मण रूपी कृष्ण ने बर्बरीक की परीक्षा लेने के लिए एक पीपल के पेड़ के सारे पत्तों को एक ही बाण से छेदने की चुनौती दी। बर्बरीक का बाण एक-एक करके सारे पत्तों को छेदने लगा। कृष्ण ने चुपके से एक पत्ता अपने पैर के नीचे दबा लिया, लेकिन बाण कृष्ण के पैर के पास आकर रुक गया।
जब कृष्ण को यकीन हो गया कि बर्बरीक अजेय है, तो उन्होंने ब्राह्मण होने के नाते उससे 'दान' मांगा। एक वीर क्षत्रिय की तरह बर्बरीक ने हामी भर दी। तब कृष्ण ने दान में उसका शीश (सिर) मांग लिया। बर्बरीक समझ गए कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं है। उन्होंने भगवान से उनका असली रूप दिखाने की विनती की और फिर बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी तलवार से अपना सिर काटकर भगवान के चरणों में रख दिया। इसी वजह से उन्हें 'शीश के दानी' कहा जाता है।
शीश को पहाड़ी पर क्यों रखा गया? (Watching the Mahabharata War)
शीश कटने के बाद भी बर्बरीक जीवित थे क्योंकि उन्होंने भगवान से महाभारत का पूरा युद्ध देखने की इच्छा प्रकट की थी। श्रीकृष्ण ने उनके शीश को अमृत से सींचा और कुरुक्षेत्र की सबसे ऊँची पहाड़ी पर रख दिया जहाँ से बर्बरीक ने पूरा युद्ध देखा।
युद्ध के अंत में जब पांडव अपनी जीत का श्रेय ले रहे थे, तब बर्बरीक के शीश ने कहा कि "इस युद्ध में सिर्फ भगवान कृष्ण का सुदर्शन चक्र चल रहा था और द्रौपदी महाकाली के रूप में रक्त पी रही थीं। यह जीत सिर्फ कृष्ण की है।"
कलियुग में 'श्याम' नाम का वरदान (The Boon of Kaliyuga)
बर्बरीक के इस महान बलिदान और निष्पक्ष न्याय से भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने बर्बरीक के शीश को वरदान दिया कि "कलियुग में तुम मेरे ही रूप और मेरे ही नाम 'श्याम' से पूजे जाओगे। जो भी भक्त सच्चे हृदय से तुम्हारे सामने शीश झुकाएगा, तुम उसके सभी दुखों का नाश करोगे।"
सदियों बाद यही पवित्र शीश राजस्थान के खाटू गाँव में प्रकट हुआ। इसी कारण खाटू धाम में सिर्फ बाबा के चमत्कारी शीश की पूजा होती है।
धड़ की पूजा कहाँ होती है? (Where is the Body Worshipped?)
यह एक ऐसा रहस्य है जो बहुत कम लोग जानते हैं। जब बर्बरीक ने अपना शीश काटा था, तो उनका शरीर (धड़) वहीं गिर गया था। मान्यताओं और सदियों पुरानी लोक-कथाओं के अनुसार, बाबा श्याम का धड़ बहते हुए हरियाणा पहुँच गया था।
आज हरियाणा के हिसार जिले के बीड़ (Beed) गाँव में एक प्राचीन मंदिर स्थित है, जिसे 'श्याम बाबा का मंदिर' कहा जाता है। यहाँ बाबा श्याम के शीश की नहीं, बल्कि उनके धड़ (शरीर) की पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ पूजा होती है। जो भक्त यह इतिहास जानते हैं, वे खाटू श्याम के दर्शन के बाद इस मंदिर में भी माथा टेकने जरूर जाते हैं।
।। बोलिए खाटू नरेश की जय ।।
।। शीश के दानी की जय ।।